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संस्कार.....

कई लोगों को कहते सुना है कि संस्कार, बुद्धि आदि विरासत में नहीं मिलते। बुद्धि का तो कह नहीं सकता लेकिन संस्कार अवश्य विरासत में ही मिलते हैं। किसी भी बालक के पहले गुरु उसके माता पिता होते हैं। अच्छे बुरे को पहचानने का विवेक और उनमें अंतर समझ सकने योग्य संस्कार बालक को माता-पिता से ही मिलते हैं। उसके आस पास के लोग तो उसे प्रभावित करते ही हैं लेकिन माता-पिता की भूमिका अहम्‌ होती है।
आजकल स्टॉर-प्लस पर नई बनी महाभारत आ रही है। पुनः महाभारत की कहानी देख मन में ऐसे ही यह बात उठ गई। सत्यवती में अच्छे संस्कार होते तो उसके पुत्र भी अच्छे संस्कार वाले होते, फिर कदाचित्‌ न तो वेद-व्यास को नियोग से अंबिका और अंबालिका को पुत्र देने पड़ते और न ही महाभारत होती। परन्तु यदि उसमें अच्छे संस्कार होते तो फिर देवव्रत को भीष्म ही न बनना पड़ता। यदि धृतराष्ट्र और गांधारी ने अपने पुत्रों को अच्छे संस्कार दिए होते तो फिर कहानी ही कुछ और बन पड़ती। माद्री के संस्कार अच्छे होते तो कदाचित्‌ पाण्डु को शाप ही न मिलता और न ही उसकी अकाल मृत्यु होती। आज भी सामान्यत: कुन्ति के पाँच पुत्र गिने जाते हैं, माद्री का नाम प्रायः नहीं आता।
मैंने बहुतया माता-पिता को एस्केप द ब्लेम खेलते देखा सुना है; बच्चे बिगड़ गए हैं, फलाने दोस्त ने या रिश्तेदार ने बिगाड़ दिया है, वगैरह वगैरह। लेकिन कितना ही दोष दूसरे के सिर मढ़ लो, माता पिता का दोष कम नहीं हो जाता। यदि बालक को अच्छे संस्कार देने का श्रेय माता-पिता को जाता है तो बालक में अच्छे संस्कार न होने का दोष भी उन्हीं का होता है।
मैं किसी पिता के दृष्टिकोण से नहीं कह सकता, उसके लिए अनुभव आवश्यक है, परन्तु बालक का दृष्टिकोण और एक थर्ड पार्टी ऑब्ज़र्वर का दृष्टिकोण मेरे पास अवश्य है। कई बार माता-पिता बालक में संस्कार और अनुशासन आदि डालने में इतना आगे निकल जाते हैं कि वे उद्देश्य पूर्ण रूप से भूल जाते हैं। नतीजा यह होता है कि डोर अधिक खिंच जाती है और बालक में माता-पिता के प्रति विद्रोह जाग उठता है। मेरी माता जी प्राय: मुझे कहा करती हैं – अति हर चीज़ की बुरी। यह बात यहाँ भी लागू होती है, एक्स्ट्रीम (extreme) में किसी भी तरफ़ जाएँगे तो लाभ कम हानि ही अधिक प्राप्त होगी।
यदि टीवी सीरियल को एक किनारे कर भी दें, तो भी इस बात को नहीं नकार सकते कि रामायण और महाभारत जैसी कहानियों में हमारे सीखने के लिए बहुत कुछ है। मैं यह नहीं कह रहा कि उनको धार्मिक ग्रंथों के रूप में देखा जाए, ईश्वर के अस्तित्व पर वाद-विवाद में पड़ा जाए। मेरा अभिप्राय केवल इतना है कि यदि इन दोनों ग्रंथों को मात्र कहानियों के रूप में ही देखा जाए तब भी इनके पास हमें देने के लिए बहुत ज्ञान है। ये दोनों ही काव्य-ग्रंथ पारिवारिक समस्याओं के मकड़ जाल हैं और प्रत्येक पात्र के कर्मों और उनके परिणामों से हम सीख ले सकते हैं।

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